महाछठ पूजा के अर्घ्य का शुभ मुहूर्त और पर्व से जुड़ी मान्यता

भारत की लोक-संस्कृतिक एवं पारंपरिक पर्वों में से एक बिहार सहित पूर्वी राज्यों में धूमधाम से मनाएं जाने वाला महाछठ पर्व है। यह भारतीय संस्कृती के पर्वों में मनाया जाने वाला सबसे कठिन पर्व में से एक है शायद इसीलिए हम इस पर्व को “महापर्व छठ” के नाम से संबोधित करते है। माना जाता है कि चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में व्रती को लगभग तीन दिन का व्रत रखना होता है, जिसमें से दो दिन तो निर्जली व्रत रखा जाता है। इस कर्णप्रिय और पारंपरिक पर्व के दौरान पूरा यूपी और बिहार का माहौल छठी मईया की पूजा-अर्चना व लोक गीतों से भक्तिमय हो चुका होता है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है, पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्लपक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है।

महाछठ पूजा के अर्घ्य का शुभ मुहूर्त-

भारतीय ज्योतिषानुसार महाछठ पूजा का पर्व कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली के बाद कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है।
  •  26 अक्टूबर (गुरुवार) की संध्याबेला (सूर्यास्त) को महाछठ पूजा के अर्घ्य का शुभ मुहूर्त 5:40 बजे से शुरू होगा।
  •  27 अक्टूबर (शुक्रवार) की प्रात: कालीन (सूर्योदय) अर्घ्य का शुभ मुहूर्त प्रात: 6.28 बजे से शुरू होगा।
ज्योतिष गणनानुसार इस बार डूबते सूर्य को अर्घ्य देने से श्रद्धालुओं को मुकदमें में फंसी जमीनी काम, सरकारी विभागों का अटका काम और स्वास्थ संबंधी काम लाभकर माना गया है।

छठ व्रत कथा की धार्मिक मान्यता-

मार्कण्डेय पुराणनुसार सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया है और इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी के रूप में जाना जाता है, जो ब्रह्मा की मानस पुत्री और बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इन्हीं देवी की पूजा की जाती है। एक कथानुसार प्रियव्रत नामक एक राजा की कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए महर्षि कश्यप ने उन्हे पुत्रयेष्टि यज्ञ करने का परामर्श दिया. यज्ञ के फलस्वरूप महारानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, किंतु वह शिशु मृत था। इस समाचार से पूरे नगर में शोक व्याप्त हो गया, तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। आकाश से एक ज्योतिर्मय विमान धरती पर उतरा और उसमें बैठी देवी ने कहा, ‘मैं षष्ठी देवी और विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूं।’ इतना कहकर देवी ने शिशु के मृत शरीर का स्पर्श किया, जिससे वह बालक जीवित हो उठा। इसके बाद से ही राजा ने अपने राज्य में यह त्योहार मनाने की घोषणा कर दी।
दूसरी मायन्ता है कि कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी के सूर्यास्त और सप्तमी के सूर्योदय के मध्य वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था। प्रकृति के षष्ठ अंश से उत्पन्न षष्ठी माता बालकों की रक्षा करने वाले विष्णु भगवान द्वारा रची माया हैं। बालक के जन्म के छठे दिन छठी मैया की पूजा-अर्चना की जाती है, जिससे बच्चे के ग्रह-गोचर शांत हो जाएं और जिंदगी मे किसी प्रकार का कष्ट नहीं आए। अत: इस तिथि को षष्ठी देवी का व्रत होने लगा।
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