सूर्योपासना का पर्व छठ पूजा, जानिए इससे जुड़ी कुछ खास बातें

सूर्य देव की पूजा का पर्व छठ पूजा, लोक आस्था का पर्व छठ पूजा, यह पवित्र त्योहार भारत में सूर्य की उपासना के लिए प्रसिद्ध है. पूर्वी भारत में इस त्योहार की बड़ी मान्यता है. बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड में इस पर्व को बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है.

आज से शुरु हो गई छठ की शुरुआत

चार दिनों तक चलने वाले इस पावन पर्व की शुरुआत आज नहाय-खाय से है. इसके बाद 25 अक्टूबर को खरना, 26 अक्टूबर को शाम का अर्घ्य और 27 अक्टूबर को सुबह के अर्घ्य के साथ छठ पूजा संपन्न हो जाएगी.

34 साल बाद बना ऐसा महासंयोग

आज से इस पर्व की शुरुआत हो चुकी है, आज यानि पहले दिन मंगलवार को गणेश चतुर्थी भी है और साथ में सूर्य का रवियोग भी. यह ऐसा संयोग पूरे 34 साल बाद बन रहा है.

सूर्यदेव हरेंगे सारे कष्ट

चूकि यह सूर्यदेव की उपासना का पर्व है तो कहा जाता है कि छठ पूजा करने से सूर्यदेव सारे कष्ट हर लेते हैं. रवियोग में इस महापर्व का विधि-विधान करने से सारी मनोकामनाएं पूरी होती है. साढ़ेसती हो या राहु-केतु भारी हो सबका हल हो जाता है. पारिवारिक सुख-समृद्धी तथा मन चाहे फल की प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है. स्त्री और पुरुष समान रूप से इस पर्व को मनाते हैं.

छठपूजा का इतिहास

छठ व्रत से जुड़ी हुई बहुत सी कथाएं प्रचलित है. यह महापर्व रामायण के समय का माना जाता है तो वहीं महाभारत से भी इसकी कथा जुड़ी हुई है. रामायण की कथा के अनुसार माना जाता है कि रावण का वध करने के बाद जब राम-सीता अयोध्या लौटे थे तो रावण के वध के पाप से मुक्त होने के लिए राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया था. पूजा के लिए मुग्दल ऋषि का आमंत्रित किया गया. ऋषि ने मां सीता पर गंगा जल छिड़कर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी को यूर्य की उपासना करने को कहा और तभी से इस पर्व की शुरुआत हुई.
महाभारत कथा के अनुसार कहा जाता है कि जब पांडव, कौरवों से अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब श्री कृष्ण द्वारा बताये जाने पर द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उनकी मनोकामनाएँ पूरी हुई तथा पांडवों को राजपाट वापस मिला गया. तभी से इस व्रत की शुरुआत हुई.

पूजा का दिन

छठ पूजा चार दिनों का पर्व है. इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को और समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है. इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं. जिसमें वे पानी भी ग्रहण नहीं करते. लोक परम्परा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है. कहते हैं लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी.

कैसे मनाते है यह पर्व?

पहले दिन सेन्धा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है.
अगले दिन से व्रत शुरु होता है. व्रत रखने वाला व्यक्ति दिनभर अन्न-जल त्याग कर शाम करीब 7 बजे से खीर बनाकर, पूजा करने के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं।
तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं और अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं. पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है, लहसून, प्याज वर्जित होता है. जिन घरों में यह पूजा होती है, वहाँ भक्तिगीत गाये जाते हैं. अंत में लोगो को पूजा का प्रसाद दिया जाता हैं.

आसान नहीं यह व्रत

यह व्रत एक कठिन तपस्या की तरह होता है, आमतौर पर यह व्रत महिलाएं रखती है मगर श्रद्धा भाव के कारण कुछ पुरुष भी यह उपवास करते हैं. जो महिलाएं उपवास करती हैं उन्हें परवैतिन कहा जाता है. सुखद सैय्या का इसमें त्याग कर दिया जाता कर दिया जाता है. इसमें जमीन पर सोना होता है. 36 घंटे पानी तक इसमें ग्रहण नहीं करना होता महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ की पूजा करते हैं.
घर में किसी मृत्यु हने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता.
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