आखिर क्यों महिलाओं को ही सहनी पड़ती है हर महीने मासिक धर्म की पीड़ा

क्यों महिलाओं का मंदिर में प्रवेश करना वर्जित है ?
एक ओर जहां हमारे समाज में पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता बढ़ती जा रही है। यानि आज पुरुष और महिलाएं हर क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं। वहीं अब भी हमारे समाज में कुछ ऐसी मान्याताएं हैं जो पुरुष और महिलाओं के अधिकारों को बांटती हैं। आपको याद होगा जब केरल में कुछ महीनों पहले महिलाओं की मंदिर में एंट्री को लेकर काफी विवाद हुआ था। ये तो किसी एक मंदिर का हाल था, लेकिन क्या आपको मालूम है कि देश में कब भी कई ऐसे पूजा- स्थल हैं, जहां महिलाओं का आना वर्जित है। महिलाएं वहां नहीं जा सकती। तो ऐसे में मन में ये सवाल उठना तो लाजमी है कि हमारे समाज में महिलाओं और पुरुषों को लेकर ऐसी दो धारणा क्यों ? महिलाओं के साथ ऐसा क्या है जिसकी वजह से उनका इन स्थलों पर जाना वर्जित है। आखिर महिलाओं ने कौन- सा ऐसा पाप किया है, जिसकी सजा उन्हें भुगतनी पड़ रही है।
ये हम सब जानते हैं कि महिलाओं को हर महीने मासिक धर्म होता है। और इस दौरान उन्हें कई नियमों का भी पालन करना पड़ता है। लेकिन क्या कोई जानता है कि आखिरकार महिलाओं को ही ये क्यों होता है और किसने इन नियमों को बनाया। दरअसल धार्मिक पुराणों में महिलाओं के मासिक धर्म को लेकर उल्लेख मिलते हैं। इससे जुड़ी एक पौराणिक कथा भी काफी प्रचलित है। आइए जानते हैं कि क्या है वो पौराणिक कथा-

भागवत पुराण की एक कथा के अनुसार बताया गया है कि एक बार देवताओं के गुरू वृहस्पति देवराज इंद्र से बेहद नाराज हो गए थे। जिसके बाद मौका पाते ही असुरों ने देवलोक पर आक्रमण कर दिया और मजबूरन इंद्र को अपना सिंहासन छोड़कर भागना पड़ा। असुरों से खुद को बचाते हुए इंद्रदेव भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे और उनसे अपना सिंहासन वापस पाने के लिए सहायता मांगी। जिसके बाद ब्रह्मा ने उन्हें एक ब्रह्म-ज्ञानी की सेवा करने का सुझाव दिया।

ब्रह्मा जी के अनुसार अगर वो ब्रह्म ज्ञानी इंद्र की सेवा से प्रसन्न होंगे तभी उन्हें सिंहासन फिर से मिलेगा। ब्रह्मा जी की आज्ञा पाकर इन्द्र एक ब्रह्म-ज्ञानी की सेवा में लग गए। लेकिन इंद्र को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस ब्रह्म ज्ञानी की माता एक असुर थीं।
यही वजह है कि इंद्र के द्वारा अर्पित की गई हवन सामग्री देवताओं की जगह वो ब्रह्म ज्ञानी असुरों को अर्पित कर रहा था। जब इंद्र को इस बात का पता चला तो उन्हें बहुत गुस्सा आया और गुस्से में आकर उन्होंने उस ब्रह्म ज्ञानी की हत्या कर दी। एक गुरू की हत्या करने के कारण इंद्रदेव पर ब्रह्म हत्या का पाप लग गया। उनका ये पाप एक भयानक राक्षस के रुप में उनका पीछा करने लगा, जिससे बचने के लिए इंद्र ने स्वयं को एक फूल के अंदर छुपा लिया और उसी के भीतर छुपकर एक लाख साल तक भगवान विष्णु की तपस्या की।
इंद्र के इस कठिन तप से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्हें अपने ऊपर लगे पाप का थोड़ा-थोड़ा अंश पेड, जल,भूमि और स्त्री को देने का सुझाव दिया।
इन सभी के राजी हो जाने पर सबसे पहले पेड़ ने इंद्र के पाप का एक चौथाई हिस्सा ले लिया जिसके बदले इंद्र ने वरदान दिया कि पेड चाहे तो स्वयं ही अपने आप को जीवित कर सकता है।
फिर जल को इंद्र ने अपने पाप का हिस्सा देते हुए उसे अन्य वस्तुओं को पवित्र करने की शक्ति प्रदान की। जिसके बाद अपने पाप का तीसरा हिस्सा इंद्र ने भूमि को दिया और इसके बदले में उन्होंने यह वरदान दिया कि उस पर आई कोई भी चोट हमेशा भर जाएगी।

आखिर में अपने पाप का चौथा हिस्सा इंद्र ने एक स्त्री को दिया। जिसके अनुसार स्त्री को हर महीने मासिक धर्म होता है लेकिन स्त्री को वरदान देते हुए इंद्र ने कहा कि वो पुरुषों से कई गुना ज्यादा काम का आनंद उठाएंगी।
इस दौरान वे ब्रह्म-हत्या यानी कि अपने गुरु की हत्या का पाप ढो रही होती हैं, इसलिए उन्हें अपने गुरु तथा भगवान से दूर रहने को कहा जाता है। यही कारण है कि प्राचीन समय से ही मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को मंदिर जाने की मनाही थी।
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