ओह! तो इस वजह से लोग लगाते हैं मंदिर में नंगे पैर परिक्रमा

हम सभी को मंदिर जाना पसंद हैं. मंदिर में प्रवेश करते ही दिमाग को एक अलग प्रकार का सुकून और शान्ति मिलती हैं. यहाँ का सकारात्मक माहोल हमारा मूड फ्रेश कर देता हैं. आप लोगो ने अक्सर देखा होगा कि मंदिर के अन्दर जब भी लोग भगवान की पूजा पाठ कर उन्हें ढोक देते हैं तो बाद में उनकी मूर्ति के चारों और घूमकर परिक्रमा अवश्य देते हैं. सिर्फ मंदिर ही नहीं बल्कि गुरूद्वारे में भी माथा टेकने के बाद परिक्रमा देने का रिवाज हैं. वहीँ कई लोग सूर्य को जल समर्पित करने के बाद भी गोल गोल घूमकर परिक्रमा करते हैं.
ऐसे में कई लोगो के मन में सवाल आता हैं कि आखिर मंदिर, गुरूद्वारे या किसी अन्य पवित्र स्थल पर भगवान के दर्शन के बाद उनकी परिक्रमा क्यों की जाती हैं. कुछ लोगो को उपरी और से बस इतनी जानकारी होती हैं कि परिक्रमा लगाने से मन की मनोकामना पूर्ण होती हैं. लेकिन असल में इस  परिक्रमा को लगाने के पीछे कई सारी वजहें छिपी हुई हैं जिसके बारे में आज हम आपको विस्तार से बताएंगे.

इस वजह से मंदिर में लगाईं जाती हैं नंगे पैर परिक्रमा

दरसल ऐसा माना जाता हैं कि जब भी हम मंदिर में भगवान के दर्शन के बाद उनकी मूर्ति के चारो ओर घूम के परिक्रमा लगाते हैं तो हमारे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती हैं. इस सकारात्मक उर्जा से हमारे शरीर को तन और मन से शान्ति प्राप्त होती हैं. इसके बाद कुछ लोगो के मन में सवाल होता हैं कि भगवान के मंदिर में नंगे पैर चलकर क्यों जाया जाता हैं. और ये परिक्रमा भी नंगे पैर ही क्यों लगाते हैं. हम आपको बता दे कि जब आप मंदिर में नंगे पैर जाते हो और परिक्रमा करते हो तो मंदिर की सकारात्मक ऊर्जा आपके पैरो के जरिए सीधा आपके शरीरी में प्रवेश करती हैं. मंदिर से मिली ये सकारात्मक उर्जा आपके शरीरी और मन की शान्ति के लिए बहुत अधिक लाभदायक होती हैं.

पौराणिक मान्यता भी हैं एक कारण 

भगवान की परिक्रमा लगाने के कारण के पीछे एक पौराणिक कथा भी काफी प्रसिद्द हैं. एक बार भगवान गणेश और कार्तिकेय के बीच दुनियां का चक्कर लगाने की प्रतियोगिता हुई थी. इस प्रतियोगिता में जहाँ एक तरफ कार्तिकेय पूरी दुनियां का चक्कर लगाने निकल पढ़े थे तो वही गणेश जी ने अपनी चतुराई से माता पिता ‘शिव पार्वती’ के चक्कर लगा लिए थे. गणेश जी का कहना था कि मेरे माता पिता ही मेरा संसार हैं. बस तभी ये ये मान्यता प्रचलित हो गई कि भगवान की मूर्ति की परिक्रमा लगाने से सुख सम्रद्धि प्राप्त होती हैं.
नोट: परिक्रमा हमेशा भगवान के दाएं हाथ से आरम्भ करनी चाहिए. 8 से 9 बार लगाईं गई परिक्रमा सबसे अधिक लाभदायक होती हैं.
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