संकट की घड़ी में कला ही आनंद और प्रेरणा की राह दिखाती है: रामबहादुर राय

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय ने कहा है कि आज पूरा विश्व कोरोना महामारी के संकट से जूझ रहा है और विज्ञान उसका कोई समाधान नहीं तलाश पा रहा है। ऐसे में कला ही हमें आनंद और प्रेरणा की राह दिखा सकती है।
राम बहादुर राय सोमवार को ‘भविष्य की कला दृष्टि’ पर आधारित फेसबुक लाइव सीरिज में ‘कोरोना के बाद कला और संस्कृति की भूमिका’ विषय पर अपना वक्तव्य दे रहे थे। उन्होंने कहा कि विज्ञान की सीमा जहां समाप्त हो जाती है, वहीं से कला की अनुभूति शुरू होती है। बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी जीवन के अंतिम पड़ाव पर धर्म के आगे नतमस्तक हुए हैं। कला धर्म की अनुभूति कराती है। कला ही हमें पूर्वजों की सांस्कृति से जोड़ती है। दुनिया की समस्याओं का समाधान विवाद में नहीं बल्कि कला में ही निहित है।

राय ने कहा कि कोरोना संकट काल के समाप्त होने के बाद देश को एक सांस्कृतिक क्रांति की आवश्यकता होगी। यह क्रांति कला के माध्यम से होगी जो ‘मैं नहीं तू ही’ का दुनिया से आहवान करेगी। उन्होंने कहा कि भारत में कला का दर्जा बहुत ऊंचा माना गया है। एक सच्चा कलाकार कभी स्वार्थी नहीं हो सकता। दुनिया की कला प्रतीक रूप में चीजों को देखती और प्रगट करती है लेकिन भारत की कला चीजों के पीछे के सत्य को अनुभव करती है और उसका संवेदन कराती है। दुनिया में महज सात कलाएं हैं लेकिन भारत में 64 कलाएं और 500 उप कलाएं हैं।
संस्कृति और सभ्यता में अंतर स्पष्ट करते हुए राय ने कहा कि संस्कृति मूल्य आधारित होती है। यह हमें प्रेरणा देती है कि हम स्वयं को जानें। दीनदयाल उपाध्याय के शब्दों में कहा जाए तो संस्कृति हमें ध्येय सिद्धि में प्रकृति के अनुकुल बनना सिखाती है। संस्कृति व्यक्ति, समाज और चिंतन को समृद्ध बनाती है। वहीं सभ्यता अविष्कार व साधन जुटाने के प्रयास हैं। संस्कृति जहां व्यवहार है, वहीं सभ्यता क्रियाकलाप है। 

उन्होंने कहा कि दीए की रोशनी पाने के लिए प्रयास करना पड़ता है लेकिन सूर्य की रोशनी पाने के लिए महज जागना पड़ता है। हमे संकट की घड़ी में जागना होगा और प्राचीन संस्कृति से जुड़ना होगा।
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