श्राद्ध महीने में केवल एक चम्मच दही, जिंदगी भर के लिए मिल जाएगी पितृ दोष से मुक्ति !

शास्त्रों के अनुसार भाद्रपद महीने की पूर्णिमा से लेकर अश्विन महीने की अमावस्या तक के सोलह दिन पितृपक्ष के नाम से जाने जाते है. जी हां यानि इन दिनों में लोग अपने मृत पूर्वजो के प्रति पूरी श्रद्धा रख कर धार्मिक काम करते है. गौरतलब है, पूर्वजो की मृत्यु तिथि के अनुसार उनका श्राद्ध मनाया जाता है और धार्मिक कर्म किये जाते है. बता दे कि जो लोग अपने पूर्वजो के प्रति श्रद्धा न रख कर श्राद्ध से संबंधित काम नहीं करते, उनके पूर्वज उनसे नाराज होकर उन्हें श्राप भी दे देते है और आम भाषा में इस श्राप को ही पितृदोष कहा जाता है.
गौरतलब है, कि पितृपक्ष में श्राद्ध करने वाले को पान खाना, तेल लगाना, क्षौरकर्म, मैथुन या पराया अन्न खाना, यात्रा करना और गुस्सा करना भी वर्जित होता है, यानि ये सब चीजे श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को श्राद्ध के दिनों में नहीं करनी चाहिए. इसके इलावा श्राद्धकर्म करते समय हाथ में जल, अक्षत, चंदन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणो द्वारा संकल्प लेना जरुरी होता है. इसके साथ ही श्राद्धकर्म में चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला नमक, काला उड़द, बासी या अपवित्र फल या अन्न आदि सब चीजे निषेध है यानि इन सब चीजों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.
गौरतलब है कि श्राद्धकर्म में अपने पूर्वजो की पसंद का भोजन जैसे दूध, दही, घी और शहद के साथ अनाज से बनने वाले पकवान जैसे खीर आदि बनाने चाहिए. इसके इलावा श्राद्धकर्म में तर्पण जरुरी है और इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल आदि सब चीजों से पितरो यानि पूर्वजो को तृप्त किया जाता है. बता दे कि श्राद्धकर्म में ब्राह्मणो को भोज करवाते समय भोज को परोसने वाले बर्तन दोनों हाथो से पकड़ने चाहिए. इसके साथ ही श्राद्धकर्म में गंगाजल, शहद, दूध, दौहित्र, कुश, तिल और तुलसी पत्र आदि का होना जरुरी है. गौरतलब है कि श्राद्धकर्म में जौ, कांगनी, मटर और सरसो का उपयोग सर्वश्रेष्ठ रहता है और श्राद्धकर्म में गाय का दूध, घी तथा दही ही प्रयोग करना चाहिए. वो इसलिए क्यूकि इसमें भैंस या बकरी का दूध वर्जित होता है.
वही श्राद्धकर्म में लोहे का किसी भी रूप में इस्तेमाल करना अशुभ माना जाता है. इसके इलावा ब्राह्मण को शांत रह कर और व्यंजनों की तारीफ किये बिना ही भोजन करवाना या करना चाहिए. बता दे कि श्राद्धकर्म में तिल का होना जरुरी है, क्यूकि तिल ही पिशाचो से श्राद्ध की रक्षा करते है. इसके इलावा श्राद्धकर्म में कुशा का होना जरुरी है, क्यूकि कुशा ही श्राद्ध को राक्षसों से बचाती है. इसके साथ ही श्राद्धकर्म में जल में काले तिल डाल कर दक्षिण दिशा की तरफ मुँह करके तर्पण करने चाहिए.

बरहलाल हम तो यही उम्मीद करते है कि इस दुनिया में किसी को अपने पूर्वजो का श्राप न झेलना पड़े और श्राद्धकर्म के दिन बिना किसी विघ्न के सम्पन्न हो जाएँ.

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