पूजा के दौरान बिंदी का प्रयोग करने से नहीं मिल पाता है शुभ कामों का फल

हिंदु धर्म में तो किसी भी महिला का श्रृंगार बिना बिंदी के अधूरा माना जाता है, लेकिन आज के समय में काफी कुछ बदल रहा है जिसके साथ साथ महिलाओं का श्रृंगार भी बदल रहा है। यही कारण है कि आज ग्‍लैमरस के मामले में भी बिंदी का प्रयोग किया जाता है। हिंदू धर्म में तो बिंदी लगाना केवल एक श्रृंगार ही नहीं है बल्कि यह एक सुहागिनों की परंपरा और संस्कार है। शादी के बाद बिंदी केवल वो ही महिला नहीं लगाती जो कि विधवा होती है, इसलिए सुहागिनों का माथा खाली रखना अच्छा नहीं माना जाता है।
लेकिन इसके बारे में आज हम जो आपको बताने जा रहे हैं वो शायद ही आपको पता होगा। जी हां क्‍योंकि अभी तक इस बारे में कभी महिलाओं ने भी नहीं सुना होगा कि जो उनके सुहाग का प्रतीक होता है वहीं उनके लिए कहीं अशुभ भी साबित होता है। ये सुनकर आपको झटका लगा होगा लेकिन ये सच है आइए जानते हैं कैसे? दरअसल अक्‍सर आपने देखा होगा कि महिलाएं परंपरागत तौर पर त्यौहारों या पूजा-पाठ जैसे धार्मिक कार्यों के दौरान भी बिंदी लगाया करती हैं लेकिन आपको बता दें कि ऐसा करने से उन्‍हें पूजा का फल नहीं मिल पाता है?

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भौहों के बीच स्थित माथे का यह स्थान महत्वपूर्ण तंत्रिका बिंदु होता है, जिसे चक्र कहते हैं। चक्र सात प्रकार के होते हैं जिनमें माथे का स्थान छठवाँ है। इसे “अजा चक्र” कहा जाता है तथा ये बुद्धिमत्ता एवं नियंत्रण का प्रतीक होता है। धारणा है कि बिंदी शरीर की ऊर्जा को बरकरार रखती है। अजा चक्र की स्थिति को ध्यान में रखें। यही वह जगह है जहां बिंदी को सही तरीके से लगाया जाना चाहिए।

वहीं योग विज्ञान के अनुसार यह शरीर का वह महत्वपूर्ण स्थान है जहां अदृश्य ब्रह्म ग्रंथि या ब्रह्म रंध्र होते हैं जो आज्ञा चक्र ही है। इसे वो जगह माना जाता है जिसे आप ध्यान लगाते हैं। वहीं शरीर की नाड़ी को छठी इंद्रीयों के रूप में माना जाता है जो आपको ब्रह्मांड से जोड़ती हैं वहीं बताया जाता है कि बिंदी के लगे होने पर आपका आज्ञा चक्र अवरुद्ध हो जाता है। इस तरह आप जब पूजा के दौरान ध्यान में होती हैं तो आपका ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ाव नहीं हो पाता। यही कारण है कि अलौकिक ऊर्जा व्यक्ति को मिलती है और जिस आध्यात्मिकता का विकास होता है वह आपके अंदर नहीं हो पाता।
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