5 सितम्बर को भूल से भी ना करें ये काम नहीं तो भुगतना पड़ेगा भारी नुकसान

हमारे हिंदू धर्म में कई सारी ऐसी मान्‍यताएं है जो मृत्यु के बाद भी करनी होती है जी हां उन्‍ही मान्‍यताओं में से एक है श्राद्ध करना। हिंदू धर्म में पितरों का स्थान उच्च दिया गया है ऐसे में पितृपक्ष को पूर्वजों के दिन के रूप में मनाया जाता है। जिससे सालभर पितरों का आशीर्वाद परिवार पर बना रहा है। इस दौरान दान-पुण्य करना और पितरों के नाम पर खाना खिलाना अच्छा माना जाता है।
कहा जाता है कि अगर किसी भी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण न किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती और फिर उसकी आत्‍मा इस संसार में भटकती रहती है इसलिए पितृपक्ष के दौरान सारे नियमों का पालन करना जरूरी होता है। वहीं आपको पता होना चाहिए कि इस दौरान क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? वहीं आपको बता दें कि इस बार पितृपक्ष 5 सितंबर से शुरू हो रहा है इस बार 15 दिनों तक नहीं बल्कि 14 दिनों तक चलेगा यानि 19 सितंबर तक।
बता दें कि पितृपक्ष में श्राद्ध करने के लिए कुछ नियम शास्‍त्रों में बताया गया है जिसमें कहा गया है कि पितरों के श्राद्ध के लिए परिवार का सबसे बड़ा पुत्र या सबसे छोटा पुत्र या फिर अगर पुत्र न हो तो नाती, भतीजा, भांजा या शिष्य ही तिलांजलि और पिंडदान दे सकते हैं। नियम के अनुसार पितरों के लिए किए जाने वाले कर्म के दौरान जेनऊ दाये कंधे पर हो। साथ ही आपका मुख दक्षिण दिशा की तरफ हो। इस तरह से आप श्राद्ध कर्म कर सकते हैं। अगर इन तरह से आप कर्म नहीं करते हैं तो फिर पितरों तो आपके द्वारा किए कर्म नहीं पहुंचता है।
बता दें कि आजकल लोग सुबह सुबह श्राद्ध का काम पूरा करने के लिए सुबह सुबह पूरी हलवा बनाकर पंडित को दे देते हैं ऐसा करने से पितर नाराज हो जाते हैं और उस थाली को पंडित भी नहीं खाते हैं इसलिए बताया गया है कि श्राद्ध का समय हमेशा जब सूर्य की छाया पैरो पर पड़ने लग जाये यानि की दोपहर के बाद ही किया जाता है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि सुबह-सुबह या फिर 12 बजे से पहले किया गया श्राद्ध पितरों तक नहीं पहुंचता है।

श्राद्ध करने के लिए सबसे पहले सुबह सुबह हलवा पूरी बनाकर और थाली बनाकर मन्दिर में पंडित को देने से श्राद्ध का फर्ज पूरा नहीं होता है। ऐसे श्राद्धकर्ता को उसके पितृगण कोसते हैं क्योंकि उस थाली को पंडित भी नहीं खाता है बल्कि कूड़ेदान में फेंक देता है। जहां सूअर, आवारा कुत्ते और पशु आदि उसे खाते हैं।

श्राद्ध के दिन लहसुन, प्याज रहित सात्विक भोजन ही बनना चाहिए। जिसमें उड़द की दाल के बड़े, चावल, दूध, घी से बने पकवान, खीर, मौसमी सब्जी जैसे तोरई, लौकी, सीतफल, भिण्डी कच्चे केले की सब्जी ही भोजन में मान्य है। आलू, मूली, बैंगन, अरबी तथा जमीन के नीचे पैदा होने वाली सब्जियां पितरों को नहीं चढ़ती है।
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